भला कौन होगा जिसने अपनी दादी,नानी के मुंह से ना सुना होगा कि.""कइसे के शिव के मनाई हों शिव मानत नइखन""
कौन मां होगी जिसने अपने बेटी की शादी में अपने दामाद को शिव और बेटी को गौरा मानकर “आपन गौरा न बियहबो शिव बउरहवा से” न गाया होगा।
लेकिन आज के आधुनिक ज़ाहिल-अनपढ़ गंवार भोजपुरी गायको ने भगवान् शिव जी को भी नही छोड़ता शिव भजन के नाम पर “छलकता हमरो गगरिया ए राजा” गाना और उसे उत्तेजक दृश्यों के साथ फिल्माना क्या शिव भजन है ?
क्या 2017 के एक महा अश्लील गीत “पलँग करें चोंय-चोंय” कि तर्ज पर “कांवर करे चोंय-चोंय” गाना शिव भजन है ? अभी दिव्या राज ने गाना फेसबुक के जरिये शेयर की है
✴जवानी हीटर से ज्यादा गर्म बा https://youtu.be/-G2uPRS7GCQ
✴साला ईयरवा छिनार,
https://www.youtube.com/watch?v=j11hc2_DIls&feature=share
✴हमरो भतार लगातार मारे https://youtu.be/cmQ9jQ8qndg
या फिर “रात दिया बुता के पिया क्या-क्या किया” और “पियवा से पहिले हमार रहलू’ के ही ट्रैक पर थोड़ा सा लिरिक्स बदलकर गाना शिव भजन है ? या फिर भोजपुरी गायकों द्वारा पार्वती जी से ये कहलवाना की “हरदिया काम न करि राजा.दरदिया दे देबs ए राजा” ये शिव जी की स्तुति है।?
...दरसल ये भोजपुरी के नाम पर कोई उत्तेजक और अश्लील सी शराब है जो हमारे कानों के माध्यम से हमारे अवचतेन में भरी जा रही है।
आज इस विकट सांस्कृतिक प्रदूषण के दौर में इस खेल को समझना और सावधान रहना जरूरी हो गया है…कि ये खेल कहाँ से शुरू हुआ है। और अब हम न चेते तो ये कहाँ तक पहुंचने वाला है......सबको पता है कि भोजपुरी संगीत का वो एक सुनहरा दौर था जब किसी गायक के ग़ले में सुर और गीत में भाव देखकर म्यूजिक कम्पनियां उसका कैसेट रिकार्ड करतीं थीं......समाज उसे बड़ी प्रतिष्ठा की नज़र से देखता था। तब कैसेट कलाकार होना अपने आप में एक स्टेटस सिंबल माना जाता था। कैसेट होना किसी गायक के सांगीतिक जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी....
लेकिन आज हम 4g से 5g में जाने वाले हैं..ये दौर आडियो, सीडी और डीवीडी से ऊपर उठकर डिजिटल भोजपुरी का वो दौर बन चुका है,जहां हर गायक खुद में एक म्यूजिक कम्पनी है,वो अपने गीत का कम्पोजर है, एडिटर भी है और उसके साथ अपने म्यूजिक का प्रमोटर भी है (भले ही चार अक्षर का ज्ञान हो या नही).. जिसे गाने,बजाने,रिकार्ड करने और श्रोता खोजने के लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं है...
उसके लिए सुर,ताल,भाव,शब्द ये दूर की कौड़ी हैं.उसके लिए सबसे बड़ी समस्या ये है कि हम अपने गीत-संगीत में ऐसा कौन सा मसाला डाल दें कि उसके गीत पर मिलियन व्यूज हो जाए.....इस मिलियन व्यूज के लिए गायक कुछ नहीं करता बस वो साल के सबसे हिट गाने की धुन को देखता है। जैसे “सैयां हमार आवतारे टेम्पो से” अगर इस का हिट गाना है..तो उसी ट्रैक पर शंकर जी आवत बाड़े टैम्पो से गा देता है...
और इसी तर्ज पर एक दो नहीं हजारों गायक-गायिका इसी अंदाज में दो कौड़ी की तुकबंदी का सहारा लेकर सावन में शंकर जी को टेम्पो पर चढ़ा देते हैं,नवरात्रि में दुर्गा जी को और छठ के सीजन में छठ माता को। पूरे साल यही क्रम चलता है।
समझ में नहीं आता कि आज जहाँ तमाम छोटी-छोटी क्षेत्रीय भाषाओं के फिल्म और संगीत को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल रहा है..
वहीं 22 करोड़ से ज्यादा बोली जाने वाली भोजपुरी का सिनेमा और संगीत चोली,नाभि,और मार देंम,फॉर देम करते हुए टेम्पो,ट्रैक्टर और जनरेटर तंबू से ऊपर उठने को तैयार नहीं है.....इस विषम हालात को अब बदलना जरूरी है.आप भोजपुरी को संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल करवाकर क्या कर लेंगे जब आपकी गुड़ से मीठी भोजपुरी के गीत अश्लीलता का पर्याय बन जाएंगे....
रिपोर्ट: - VIKASH MISHRA




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